अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज़ के कुछ ही समय बाद OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद देश में OTT सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल कंटेंट रेगुलेशन को लेकर बहस तेज हो गई है। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि अब तक फिल्म हटाने को लेकर कोई सार्वजनिक सरकारी आदेश सामने नहीं आया है, जबकि सरकार का पक्ष यह रहा है कि रिलीज़ आईटी नियम, 2021 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
निर्देशक का दावा: सरकार के दबाव का हवाला
फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि फिल्म रिलीज़ होने के लगभग 48 घंटे बाद उन्हें प्लेटफॉर्म की ओर से सूचना दी गई कि सरकारी दबाव के चलते फिल्म हटाई जा रही है। वहीं, प्लेटफॉर्म की ओर से जारी आधिकारिक बयान में केवल “मौजूदा परिस्थितियों” का हवाला दिया गया।
सेंसर बोर्ड से भी रहा विवाद
फिल्म के प्रमाणन को लेकर पहले भी विवाद सामने आया था। फिल्म समीक्षकों और रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म में कई बदलाव सुझाए थे। इनमें कथित तौर पर कुछ नाम, स्थान और संवाद बदलने जैसी आपत्तियां शामिल थीं। निर्माताओं ने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया और मामला कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा।
फिल्म इंडस्ट्री में बढ़ी चिंता
फिल्म उद्योग से जुड़े कई निर्माता, लेखक और निर्देशकों का मानना है कि यह मामला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में राजनीतिक या ऐतिहासिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए भी एक संकेत माना जा रहा है। कई फिल्मकारों का कहना है कि OTT प्लेटफॉर्म पर कंटेंट हटाने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि निर्माता स्पष्ट रूप से जान सकें कि आपत्ति किस आधार पर उठाई गई।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
‘सतलुज’ विवाद से पहले भी कई फिल्में और वेब सीरीज विवादों में रही हैं। ‘तांडव’, ‘अन्नपूर्णी’, ‘आईसी-814: द कंधार हाईजैक’, ‘द सूटेबल बॉय’ और ‘संतोष’ जैसी फिल्मों और सीरीज को भी विरोध, शिकायतों या कानूनी विवादों के बाद बदलाव या हटाए जाने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
OTT नियमों पर फिर उठे सवाल
भारत में सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली फिल्मों को CBFC से प्रमाणन लेना अनिवार्य है, जबकि OTT प्लेटफॉर्म सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत सेल्फ-रेगुलेशन व्यवस्था का पालन करते हैं। यही वजह है कि OTT कंटेंट को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस लगातार जारी है।
कारोबार और रचनात्मक स्वतंत्रता दोनों पर असर
फिल्म उद्योग के जानकारों का मानना है कि किसी फिल्म का विवादों में घिरना केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के निवेश से जुड़े कारोबार पर भी असर डालता है। कई स्वतंत्र फिल्मकारों का कहना है कि यदि किसी फिल्म को रोका या हटाया जाता है, तो उसके कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने चाहिए, ताकि भविष्य में कंटेंट निर्माण को लेकर स्पष्टता बनी रहे।
नोट: यह विषय सार्वजनिक बहस और विभिन्न पक्षों के दावों से जुड़ा है। फिल्म हटाने के कारणों को लेकर अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग बयान सामने आए हैं और इस मामले पर आधिकारिक स्तर पर सीमित जानकारी ही सार्वजनिक की गई है।









